Thursday, October 1, 2009

और हम सोचते है हम बापू को समज रहे है ?




आज कल गाँधी जी पर कुछ भी कमेन्ट करना बड़ा सहज हो चूका है! बस थोडी...उनकी आत्मा कथा  क्या पढ़ ली बहुत से लोग उनकी जीवनी पर कमेंट्स कर लेते है !

गाँधी जयंती के इस अवसर पर में कुछ बापू की कही गयी वाणी टाइप कर रहा हूँ !


कैसे रहे होंगे महात्मा ? उनकी आत्मा-कथा जब आप पड़ेंगे तोह आप ऐसा भी महसूस करे की वोह सत्य की खोज पर ज्यादा केन्द्रित है !  इसी लिए उन्होने आपनी बायोग्राफी का नाम अंग्रेजी में "माय एक्स्पेरित्मेंट विथ ट्रुथ" का शीर्षक दिया!





जो इंसान एक्सपेरिमेंट (संशोधन) करता हो ( सच के साथ !) वोह कभी ऐसा नही कहेता की येही सच है ...उनका संशोधन बस चलता ही रहा...और उनके करीबी मित्र , नेता काफी परेशांन रहे होंगे की यह व्यक्ति राज नीति में कभी भी जल्दी निर्णय नही ले सकते!  शायद पंडित जी , सरदार पटेल जैसे नेता ऐसा ही सोचते होंगे!  ऐसा भी हो सकता है की गाँधी जी ने कभी राजनीती का रास्ता या पदवी नही ली! नही लीना चाहते थे ! हो सकता है  काफी पहले ही उन्होने जान लिया हो की वोह कुर्सी पर, यानी की राज गद्दी पर नही बैठना चाहते है!

पर हमारे देश के नेता और पडोसी देश के नेता ने उन्हे बहुत गहरे पॉलिटिक्स में उतार रखा है !  अगर आप को कुछ किताब का सेल ज्यादा करना है तोह कमेन्ट कर लो गाँधी पर! खोद दो १९४०-१९४७ की हिस्ट्री और दाल दो गाँधी का नाम! पर किसी ने नही सोचा की गाँधीजी राजनेता नही थे! काफी सरल व्यक्तित्व रहा होगा उनका ! उनको समजना हो... तोह थोडा सरल होना पड़ता है और उनके जैसा थोडा तोः बनना पड़ता ही है पर ... ऐसा होना कठीण है !  सच का रास्ता आसान नही है! और चूकी ऐसा लोग नही कर पाते, वोह गाँधी को समजे बिना ही गलत राह  देते है !
 
नीचे है  कुछ गाँधी जी के विचार इस गाँधी जयंती के अवसर पर ...




सत्य की खोज!
सत्य.... क्या है? यह एक कठिन प्रश्न है, लेकिन अपने लिए मैंने इसे यह कहकर सुलझा लिया है कि जो तुम्हारे अंतःकरण की आवाज कहे, वह सत्य है। आप पूछते हैं कि यदि ऐसा है तो भिन्न-भिन्न लोगों के सत्य परस्पर भिन्न और विरोधी क्यों होते हैं? चूंकि मानव मन असंख्य माध्यमों के जरिए काम करता है और सभी लोगों के मन का विकास एक-सा नहीं होता इसलिए जो एक व्यक्ति के लिए सत्य होगा, वह दूसरे के लिए असत्य हो सकता है। अतः जिन्होंने ये प्रयोग किए हैं, वे इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि इन प्रयोगों को करते समय कुछ शर्तों का पालन करना जरूरी है।
ऐसा इसलिए है कि आजकल हर आदमी किसी तरह की कोई साधना किए बगैर अंतःकरण के अधिकार का दावा कर रहा है, और हैरान दुनिया को जाने कितना असत्य थमाया जा रहा है। मैं सच्ची विनम्रता के साथ तुमसे कहना चाहता हूं कि जिस व्यक्ति में विनम्रता कूट-कूट न भरी हो, उसे सत्य नहीं मिल सकता। यदि तुम्हें सत्य के सागर में तैरना है, तो तुम्हें अपनी हस्ती को पूरी तरह मिटा देना होगा ।


एक बात और मेरे मन में पक्की होती जा रही है कि जो कुछ मेरे लिए संभव है, वह एक बच्चे के लिए भी संभव है। यह बात मैं ठोस कारणों के आधार पर कह रहा हूं। सत्य की खोज के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं। अहंकारी व्यक्ति को वे काफी कठिन लग सकते हैं और अबोध शिशु को पर्याप्त सरल।


सत्य के खोजी को धूलि के कण से भी अधिक विनम्र होना चाहिए। धूलि के कणों को तो दुनिया अपने पैरों तले रौंदती है, लेकिन सत्य का खोजी इतना विनम्र होना चाहिए कि उसे धूलिकण भी रौंद सकें। तभी, और केवल तभी, उसे सत्य के दर्शन सम्भव होंगे।


सतत अनुभव ने मेरा यह विश्वास दृढ़ कर दिया है कि ईश्वर सत्य के अलावा और कुछ नहीं हैं.... सत्य की जो क्षणिक झलकियां..... मैं पा सका हूं, उनसे सत्य के अवर्णनीय तेज का वर्णन करना संभव नहीं है, सत्य का तेज नित्य दिखाई देने वाले सूर्य के प्रकाश से लाखों गुना प्रखर है।


 सत्य प्रत्येक मनुष्य के हृदय में वास करता है, और मनुष्य को उसे वहीं खोजना चाहिए; सत्य जिसे जैसा दिखाई दे, वह उसी से निर्देशित हो। लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्य का जिस रूप में दर्शन करता है, उसके अनुसार चलने के लिए दूसरे लोगों पर जोर-जबर्दस्ती करे।


मैं कितना ही तुच्छ होऊं, पर जब मेरे माध्यम से सत्य बोलता है तब मैं अजेय बन जाता हूं। मैं एक ही ईश्वर का दास हूं और वह है सत्य।


 मैंने ईश्वर के न तो दर्शन किए हैं और न ही उन्हें जाना है। मैंने ईश्वर के प्रति दुनिया की आस्था को अपनी आस्था बना लिया है, और चूंकि मेरी आस्था अमिट है, मैं उस आस्था को ही अनुभव मानता हूं। लेकिन यह कहा जा सकता है कि आस्था को अनुभव मानना तो सत्य के साथ छेड़छाड़ करना है; सचाई शायद यह है कि ईश्वर के प्रति अपनी आस्था का वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।


ईश्वर सत्य है, पर वह और भी बहुत कुछ है। इसीलिए मैं कहता हूं कि सत्य ईश्वर है... केवल यह स्मरण रखें कि सत्य ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुण नहीं है। सत्य तो ईश्वर का जीवंत स्वरूप है, यही जीवन है, मैं सत्य को ही परिपूर्ण जीवन मानता हूं। इस प्रकार यह एक मूर्त वस्तु है, क्योंकि संपूर्ण सृष्टि, संपूर्ण सत्ता ही ईश्वर है और जो कुछ विद्यमान है- अर्थात सत्य- उसकी सेवा ईश्वर की सेवा है।



कला की आंतरिकता


मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो।



वस्तुओं के दो पक्ष होते है। ...बाह्य और आंतरिक... बाह्य का मूल्य केवल यह है कि वह आंतरिक की सहायता करे। इस प्रकार प्रत्येक सच्ची कला आत्मा की अभिव्यक्ति होती है। बाहय रूपों का मूल्य यही है कि वे मनुष्य की आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति हैं।




मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं, और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है, लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता। वही



प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाहय रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।
हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों; मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश हो निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की स्वकृत कला कभी नहीं कर सकती।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इंकार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि ये प्राकृतिक सौंदर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। मानवकृत इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती है! 

अपने बारे में
मैं सोचता हूं कि वर्तमान जीवन से 'संत' शब्द निकाल दिया जाना चाहिए। यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है। मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का अहसास है और जब-जब उससे गुटिया! हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है और जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ 'शाश्वत सच्चाइयों' के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी पद्धतियों की वैज्ञानिक यथार्थता का उसके पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और न ही वह अपने प्रयोगों के ऐसे प्रत्यक्ष परिणाम दिखा सकता है जैसे कि आधुनिक विज्ञान को चाहिए।


मुझे संत कहना यदि संभव भी हो तो अभी उसका समय बहुत दूर है। मैं किसी भी रूप या आकार में अपने आपको संत अनुभव नहीं करता। लेकिन अनजाने में हुई भूलचूकों के बावजूद मैं अपने आपको सत्य का 
पक्षधर अवश्य अनुभव करता हूं।
 मैंने कभी अपने आपको संन्यासी नहीं कहा। संन्यास बड़ी कठिन चीज है। मैं तो स्वयं को एक गृहस्थ मानता हूं जो अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर, मित्रों की दानशीलता पर जीवन निर्वाह करते हुए, सेवा का विनम्र जीवन जी रहा है... मैं जो जीवन जी रहा हूं वह पूर्णतया सुगम और बड़ा सुखकर है, यदि सुगमता और सुख को मनःस्थिति मान लें तो। मुझे जो कुछ चाहिए, वह सब उपलब्ध है और मुझे व्यक्तिगत पूंजी के रूप में कुछ भी संजोकर रखने की कतई जरूरत नहीं है।

बिना आस्था के काम करना ऐसा ही है जैसा कि बिना पेंदे के गर्त का पेंदा ढूंढना। 


मुझे मेरे संपूर्ण दोषों के साथ ही स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं एक सत्यशोधक हूं। मेरे लिए मेरे प्रयोग सर्वोलम तैयारी वाले हिमालय अभियानों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं


जब भी मैं किसी दोषी व्यक्ति को देखता हूं तो मैं अपने आप से कहता हूं की मैंने भी गलतियां की हैं; जब मैं किसी कामुक व्यक्ति को देखता हूं तो अपने आप से कहता हूं की मैं भी कभी ऐसा ही था; और इस प्रकार दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के साथ मैं अपनी नातेदारी, अपनी बंधुता अनुभव करता हूं और यह अनुभव करता हूं कि जब तक हम में से सर्वाधिक दीन व्यक्ति सुखी नहीं होगा, मैं भी सुखी नहीं हो सकता। 

विरोधियों का सम्मान



मुझे सदा यह देखकर संतोष का अनुभव हुआ है कि मैं जिनके सिद्धांतों और नीतियों का विरोध करता हूं, वे भी प्रायः मेरे प्रति अपना प्रेम और विश्वास यथावत बनाए रखते हैं। दक्षिण अफ्रीकियों ने भी व्यक्तिगत स्तर पर मुझे अपना विश्वास और मित्रता दी।
ब्रिटिश नीति और प्रणाली की भर्त्सना करने के बावजूद मुझे हजारों अंग्रेज स्त्री-पुरुषों का स्नेह प्राप्त है और आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता की पूरी तरह निंदा करने पर भी मेरे यूरोपीय और अमरीकी मित्रों की संख्या बढ़ती ही जाती है यह भी अहिंसा की ही विजय है।
गांधीजी का प्रिय भजन



वैष्णव जन तो तेने कहिये,


जे पीड पराई जाणे रे।।


पर दृखे उपकार करे तोये,


मन अभिमान न आणे रे।।


सकल लोकमां सहुने वंदे,


निंदा न करे केनी रे।।


वाच काछ मन निश्चल राखे,


धन-धन जननी तेनी रे।।


समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी,


परत्री जेने ताम रे।।


जिहृवा थकी असत्य न बोले,


पर धन नव झाले हाथ रे।।


मोह माया व्यापे नहि जेने,


दृढ वैराग्य जेना मनमां रे।।


रामनाम शुं ताली लागी,


सकल तीरथ तेना तनमां रे।।


वणलोभी ने कपटरहित छे,


काम क्रोध निवार्या रे।।



भणे नरसैयों तेनु दरसन करतां,
कुळ एकोतेर तार्या रे।।